हाईकोर्ट ने डोसीगांव मल्टी के फ्लैटों पर यथास्थिति बनाए रखने के दिए आदेश, नगर निगम से 3 सप्ताह में मांगा जवाब, डोसीगांव ईडब्ल्यूएस मल्टी बेदखली मामले में मिला स्टे

The High Court has ordered the status quo on the Dosigaon Multi-Flat flats, and has requested a three-week response from the Municipal Corporation. A stay has been granted in the Dosigaon EWS Multi-Flat eviction case

हाईकोर्ट ने डोसीगांव मल्टी के फ्लैटों पर यथास्थिति बनाए रखने के दिए आदेश, नगर निगम से 3 सप्ताह में मांगा जवाब, डोसीगांव ईडब्ल्यूएस मल्टी बेदखली मामले में मिला स्टे

डेली जर्नल हिंदी डेस्क 

रतलाम शहर के जावरा रोड स्थित झोपड़पट्टियों से विस्थापित कर डोसीगांव स्थित प्रधानमंत्री आवास योजना की बहुमंजिला इमारतों (EWS फ्लैटों) में बसाए गए गरीब परिवारों की बेदखली के मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने बड़ा आदेश दिया है। न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट की पीठ ने याचिका 'रंम्बा बाई एवं अन्य बनाम मध्यप्रदेश शासन' की सुनवाई करते हुए अगली सुनवाई तक वर्तमान स्थिति यथावत (Status Quo) बनाए रखने के निर्देश जारी किए हैं। इसके साथ ही अदालत ने नगर निगम को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह के भीतर अपना जवाब प्रस्तुत करने का समय दिया है। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अंशुमन श्रीवास्तव, नवेन्दु जोशी और रोहित शर्मा ने कोर्ट में पक्ष रखा।

ऋण का आश्वासन और 3 दिन के नोटिस पर बेदखली का आरोप

मामले के अनुसार जावरा रोड पर लंबे समय से रह रहे अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों को डोसीगांव की मल्टी में ईडब्ल्यूएस फ्लैट आवंटित किए गए थे। उस दौरान हितग्राहियों से ₹20,000 जमा कराकर शेष ₹1.80 लाख की राशि के लिए नगर निगम द्वारा बैंक ऋण उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया गया था। हालांकि, निगम सभी प्रभावितों को बैंक ऋण दिलाने में असफल रहा, जिसके बाद 31 जुलाई को 208 फ्लैटधारियों को महज 3 दिनों के भीतर ₹1.80 लाख जमा करने का नोटिस थमा दिया गया। आरोप है कि 5 अगस्त को बिना आवंटन निरस्त किए नगर निगम ने गरीबों का सामान बाहर निकालकर फ्लैटों पर ताले जड़ दिए, जिसके खिलाफ पीड़ितों ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

बैंक लोन मिले तो पूरी राशि चुकाने को तैयार हैं पीड़ित: पारस सकलेचा

याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट के समक्ष स्पष्ट किया है कि यदि नगर निगम प्रशासनिक स्तर पर पहल कर उन्हें बैंक से लोन दिला देता है, तो वे ₹1.80 लाख की पूरी राशि जमा करने के लिए तैयार हैं। इधर, पूर्व विधायक पारस सकलेचा ने नगर निगम की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब बैंक ऋण दिलाना नगर निगम की नैतिक जिम्मेदारी थी, तो उसकी प्रशासनिक नाकामी की सजा गरीब परिवारों को क्यों दी जा रही है? एक तरफ गरीबों को बेदखल कर दिया गया और दूसरी तरफ उनका आवंटन रद्द किया जा रहा है। फिलहाल हाईकोर्ट के इस फैसले से बेघर हुए प्रभावित परिवारों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद जगी है।



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