हाईकोर्ट के स्टे के बाद भी विज्ञापन और अब यू-टर्न, पूर्व विधायक पारस सकलेचा ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर उठाए गंभीर सवाल

Advertisement despite High Court stay and now U-turn, Paras Saklecha raises serious questions on the functioning of the Municipal Corporation

हाईकोर्ट के स्टे के बाद भी विज्ञापन और अब यू-टर्न, पूर्व विधायक पारस सकलेचा ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर उठाए गंभीर सवाल

डेली जर्नल हिंदी डेस्क 

रतलाम, डोसीगांव मल्टी में शिफ्ट किए गए शिवनगर एवं प्रकाशनगर की झुग्गी-बस्तियों के गरीब परिवारों को आवंटित फ्लैटों के मामले में नगर निगम प्रशासन की कार्यप्रणाली पर पूर्व विधायक व पूर्व महापौर पारस सकलेचा ने जोरदार हमला बोला है। सकलेचा ने जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि इंदौर हाईकोर्ट के स्थगन (स्टे) आदेश के बावजूद दो-दो बार आवंटन निरस्ती के विज्ञापन जारी करना और अब अचानक फ्लैट निरस्त न करने का निर्णय लेना पूरे मामले को संदिग्ध बनाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह पूरी प्रक्रिया महापौर और एमआईसी को कानूनी उलझनों में फंसाने का एक षड्यंत्र प्रतीत होती है।

एमआईसी की अनुमति और पुलिस कार्रवाई पर उठाए सवाल

पारस सकलेचा ने सवाल किया कि 5 अगस्त को जब बिना आवंटन निरस्त किए ही भारी पुलिस बल, एसडीएम और तहसीलदार की मौजूदगी में गरीबों को फ्लैटों से बाहर निकालकर उनका सामान फेंका गया, तब क्या एमआईसी की स्वीकृति ली गई थी? उन्होंने पूछा कि हाईकोर्ट के स्टे के बावजूद आवंटन निरस्ती के विज्ञापन निकालने के लिए क्या एमआईसी की अनुमति ली गई थी? यदि अब निर्णय बदला जा रहा है, तो महापौर और एमआईसी को यह समझना होगा कि यह पूरा खेल किसके इशारे पर रचा जा रहा है।

विधायक चैतन्य काश्यप को घेरा: 40 दिनों से दर-दर भटक रहे गरीब

क्षेत्रीय विधायक चैतन्य काश्यप से सीधा सवाल करते हुए सकलेचा ने कहा कि जिन गरीब परिवारों के पास ₹20 हजार की मार्जिन मनी तक नहीं थी और जिनकी मदद की गई थी, उन्हीं परिवारों से मात्र तीन दिन के भीतर एकमुश्त ₹1.80 लाख की मांग करना पूरी तरह अनुचित है। उन्होंने कहा कि बकाया वसूली की अपनी एक कानूनी प्रक्रिया होती है, लेकिन गरीबों को बेघर कर महिलाओं और बच्चों को पिछले 40 दिनों से बरामदों, झुग्गियों व बंद पड़े टॉयलेट में रहने को मजबूर करना अमानवीय है। उद्योगपतियों की हजारों करोड़ की देनदारियों पर चुप्पी साधने वाले प्रशासन की इस दोहरी नीति पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि गरीबों को चुनाव के वक्त नहीं, बल्कि संकट के समय जनप्रतिनिधि की असली जरूरत होती है।

ADVERTISEMENT