ब्लास्ट ने उजड़ा एक और घर, बूढ़ी मां और मासूम बच्चों के सिर से उठा कमाने वाले व्यक्ति रफ़ीकुद्दीन का साया, अब कौन दिलवाएगा बच्चों को तालीम? पिता की मौत के बाद अंधेरे में डूबा भविष्य।"

The blast destroyed another home, the shadow of the breadwinner Rafiquddin was lifted from the heads of the old mother and innocent children. Now who will provide education to the children?

ब्लास्ट ने उजड़ा एक और घर, बूढ़ी मां और मासूम बच्चों के सिर से उठा कमाने वाले व्यक्ति रफ़ीकुद्दीन का साया, अब कौन दिलवाएगा बच्चों को तालीम? पिता की मौत के बाद अंधेरे में डूबा भविष्य।"

डेली जर्नल हिंदी डेस्क 

रतलाम, नियति की क्रूरता और आर्थिक तंगी ने आखिरकार एक और हंसते-खेलते परिवार को अंधेरे में धकेल दिया। लक्कड़पीठा स्थित बंदूक की दुकान में 26 जनवरी को हुए भीषण ब्लास्ट के जख्मों से जूझ रहे वेल्डर रफीकुद्दीन ने 24 दिनों के लंबे संघर्ष के बाद अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में दम तोड़ दिया। दुकान मालिक यूसुफ अली के बाद इस हादसे में यह दूसरी मौत है। लेकिन रफीकुद्दीन की मौत सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि उस बेबसी की दास्तां है जहां एक गरीब इंसान अस्पताल के बढ़ते बिलों और रुपयों की किल्लत के आगे घुटने टेक देता है।

अस्पताल के बिलों ने तोड़ी हिम्मत, खुद लिया था अहमदाबाद जाने का फैसला

रफीकुद्दीन का इलाज पहले इंदौर के चोइथराम अस्पताल में चल रहा था। परिजनों के अनुसार, अस्पताल ने पहले 2 लाख का एस्टीमेट दिया था, लेकिन बिल लगातार बढ़ता ही जा रहा था। आर्थिक तंगी के कारण जब इंदौर में इलाज जारी रखना नामुमकिन हो गया, तो खुद रफीकुद्दीन ने यह बड़ा फैसला लिया कि उन्हें अहमदाबाद ले जाया जाए। 15 फरवरी की शाम वे उम्मीदों के साथ अहमदाबाद के लिए निकले थे, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। गुरुवार शाम 6 बजे उन्हें वेंटिलेटर पर शिफ्ट किया गया और रात 9 बजे उनकी सांसों की डोर टूट गई। शुक्रवार की सुबह रफ़ीकुद्दीन का अहमदाबाद में ही पीएम हुआ और फिर रतलाम के लिए एम्बुलेंस से रतलाम लेकर आए।

बूढ़ी मां, पत्नी और दो मासूमों के सिर से उठा साया

रफीकुद्दीन अपने परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य थे। उनकी मौत के बाद अब पीछे एक ऐसा परिवार बचा है जिसका भविष्य पूरी तरह अधर में लटक गया है। बूढ़ी मां बदरुन्निसा जिनकी आंखों की रोशनी अब सिर्फ आंसू बनकर बह रही है। शरीर में ताकत कम है। पत्नी अंजुम शेख के सामने अब बच्चों को पालने और घर चलाने की पहाड़ जैसी चुनौती है। बेटी अर्शी शेख कक्षा 10वीं में होकर जो नवीन कन्या स्कूल में पढ़ रही है और जिसके सिर पर बोर्ड परीक्षा के साथ-साथ पिता को खोने का दुख है। बेटा अनसुद्दीन शेख कक्षा 6वीं में होकर जो गांधी स्कूल का छात्र है और अभी यह समझने के लिए बहुत छोटा है कि अब उसकी उंगली पकड़कर स्कूल छोड़ने वाला कोई नहीं रहा।

अब कैसे चलेगा घर? समाज और प्रशासन से गुहार

एक मामूली वेल्डर का काम करके रफीकुद्दीन अपने परिवार का गुजर-बसर कर रहे थे। अब जब घर का मुख्य स्तंभ ही गिर गया है, तो बड़ा सवाल यह है कि इस परिवार की देखभाल कौन करेगा? बच्चों की पढ़ाई का खर्च, घर का राशन और बूढ़ी माँ की दवाइयों का इंतजाम कैसे होगा? यह समय रतलाम के समाजसेवियों, प्रशासनिक अधिकारियों और सक्षम नागरिकों के आगे आने का है। क्या शासन इस पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा और बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी उठाएगा? क्या समाज इस परिवार को फिर से पैरों पर खड़ा करने में मदद करेगा? रफीकुद्दीन तो चले गए, लेकिन उनके पीछे छूटे इस परिवार को आपकी संवेदनाओं और आर्थिक सहयोग की सख्त दरकार है।