रतलाम में मतदाता पुनरीक्षण पर प्रशासन का खंडन, पर आधे सच ने बढ़ाई जनता की चिंता
Ratlam administration denies voter revision, but half-truths raise public concerns
डेली जर्नल हिंदी डेस्क
रतलाम, जिले में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण 2025–26 को लेकर बीते दिनों कई मतदान केंद्रों में फॉर्म वितरण और डिजिटाइजेशन में देरी के आरोप सामने आए थे, जिसके बाद जिला प्रशासन ने एक आधिकारिक खंडन जारी करते हुए इन समाचारों को भ्रामक बताया है। प्रशासन का दावा है कि जिले में 99.26 प्रतिशत गणना पत्रकों का वितरण पूरा किया जा चुका है और 11,24,035 मतदाताओं में से 11,15,717 घरों तक फॉर्म पहुँच चुके हैं। यह भी कहा गया है कि पुनरीक्षण का कार्य सतत जारी है और 1297 बीएलओ इसके लिए मैदान में तैनात हैं।
हालांकि प्रशासन के इस दावे के साथ ही एक बड़ा विरोधाभास उभरकर सामने आया है। पिछले तीन दिनों में स्वयं कलेक्टर एवं जिला निर्वाचन अधिकारी द्वारा कई बीएलओ के खिलाफ गंभीर आरोपों वाले कारण बताओ नोटिस, वेतन रोकने के आदेश और निलंबन की कार्रवाइयाँ जारी की गई हैं। इन आदेशों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कई बीएलओ ने फॉर्म प्राप्त ही नहीं किए, कुछ ने क्षेत्र में वितरण कार्य शुरू नहीं किया और कई मतदान केंद्रों पर प्रगति शून्य पाई गई। डिजिटाइजेशन की स्थिति तो और भी चिंताजनक बताते हुए कई आदेशों में यह उल्लेख है कि कुछ बीएलओ ने केवल एक या दो फॉर्म तक ही डिजिटाइज किए थे।
प्रशासन द्वारा जारी खंडन केवल फॉर्म वितरण के आंकड़ों पर आधारित है, जबकि पुनरीक्षण का असली कार्य—फॉर्म वापस लेना और उनका डिजिटाइजेशन—खंडन में पूरी तरह अनुपस्थित है। यही वह बिंदु है जिस पर जनता के बीच सबसे अधिक असमंजस और चिंता पैदा हुई है। फॉर्म घर-घर पहुंच जाना जरूरी है, लेकिन जब तक वे वापस लेकर ऑनलाइन दर्ज नहीं किए जाते, तब तक मतदाता सूची में सुधार, परिवर्तन और नए नाम जोड़ने की प्रक्रिया अधूरी ही रहती है। प्रशासन का खंडन इस महत्वपूर्ण हिस्से पर मौन साधे हुए है।
जनता के बीच यह सवाल भी जोर पकड़ रहा है कि यदि फॉर्म वितरण लगभग पूरा था, जैसा कि खंडन में कहा गया है, तो फिर बड़ी संख्या में बीएलओ पर कार्रवाई की ज़रूरत क्यों पड़ी? क्या निगरानी तंत्र समय पर सक्रिय नहीं था, या क्या कुछ क्षेत्रों में जमीनी रिपोर्टों को प्रशासन ने पहले नजरअंदाज किया? कलेक्टर द्वारा जारी नोटिसों में जिन वार्डों में गंभीर कमियों का उल्लेख किया गया है, उन क्षेत्रों में 99 प्रतिशत वितरण का दावा स्वाभाविक रूप से संदेह के घेरे में आता है।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस पूरे विवाद का केंद्र जनता का मताधिकार है। मतदाता सूची में देरी, गलत प्रविष्टि या नाम न जुड़ने जैसी समस्याएँ सीधे-सीधे लोगों के मतदान अधिकार को प्रभावित करती हैं। मतदाताओं, पते बदलने वाले परिवारों और नाम सुधार कराने वाले लोगों को अभी भी यही चिंता है कि अगर डिजिटाइजेशन में देरी होती रही, तो आगामी चुनावों में उनका नाम सूची में दर्ज भी होगा या नहीं। खंडन इन वास्तविक सवालों का जवाब देने में असफल दिखाई देता है।
रतलाम की जनता अब प्रशासन से संपूर्ण तस्वीर की अपेक्षा कर रही है। यह जानने की कि कितने फॉर्म वापस आए, कितने डिजिटाइज हुए, कौन से क्षेत्रों में बीएलओ अनुपस्थित थे, और किन जगहों पर प्रक्रिया धीमी पड़ी। जब तक प्रशासन केवल चुनिंदा आंकड़े जारी करता रहेगा, और मैदान में पाई गई कमियों पर स्पष्टता नहीं देगा, तब तक यह विवाद थमने वाला नहीं है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पारदर्शिता ही विश्वास का आधार है, और फिलहाल जनता उसी पारदर्शिता की प्रतीक्षा कर रही है।