हाईकोर्ट के 'यथास्थिति' आदेश के बावजूद नगर निगम की गरीबों को बेदखली की चेतावनी, पूर्व विधायक सकलेचा ने उठाए सवाल
Despite the High Court's 'status quo' order, the Municipal Corporation threatens eviction of the poor, raising questions against former MLA Saklecha
डेली जर्नल हिंदी डेस्क
रतलाम नगर निगम एक बार फिर विवादों के घेरे में है। शिवनगर और प्रकाश नगर की झोपड़पट्टियों से विस्थापित कर डोसीगांव स्थित ईडब्ल्यूएस (EWS) फ्लैटों में बसाए गए गरीब परिवारों को अब नगर निगम ने आवंटन निरस्तीकरण की चेतावनी दी है। पूर्व विधायक पारस सकलेचा द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, नगर निगम ने इन परिवारों को व्यक्तिगत रूप से नोटिस देने के बजाय समाचार पत्र में एक विज्ञप्ति प्रकाशित कर आगामी 11 सितंबर तक 1.80 लाख रुपये जमा करने का फरमान जारी किया है।विज्ञप्ति में स्पष्ट किया गया है कि निर्धारित तिथि तक राशि जमा नहीं कराने की स्थिति में फ्लैट का आवंटन निरस्त कर दिया जाएगा।
उच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना का आरोप
यह पूरा मामला इसलिए अत्यंत गंभीर हो गया है क्योंकि इसी प्रकरण में माननीय उच्च न्यायालय इंदौर ने बीते 20 अगस्त को 'यथास्थिति' (Status Quo) बनाए रखने का स्पष्ट आदेश दिया था। हाईकोर्ट के इस स्थगन आदेश के बावजूद नगर निगम द्वारा आवंटन निरस्त करने की खुली धमकी देना सीधे तौर पर न्यायालयीन आदेश की अवहेलना और विधिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। पूर्व विधायक सकलेचा ने नगर निगम के इस तर्क पर भी सवाल उठाए हैं कि उन्हें अभी तक न्यायालय का लिखित आदेश प्राप्त नहीं हुआ है। उन्होंने पूछा कि क्या हाईकोर्ट का आदेश तभी प्रभावी माना जाएगा जब उसकी भौतिक प्रति नगर निगम के दफ्तर तक पहुंचेगी? क्या समाचार पत्रों में प्रमुखता से प्रकाशित यथास्थिति का आदेश नगर निगम के संज्ञान में नहीं आया?
बेघर कर ताले जड़े, अब अखबार में फरमान
नगर निगम की संवेदनशीलता पर प्रश्न उठाते हुए विज्ञप्ति में बताया गया कि बीते 5 अगस्त को भारी पुलिस बल की मौजूदगी में इन गरीब परिवारों को फ्लैटों से जबरन बाहर निकाल दिया गया था। आरोप है कि उनका सामान बाहर फेंक कर फ्लैटों पर ताले जड़ दिए गए। इस कार्रवाई के बाद से 30 से अधिक परिवार मल्टी के बरामदे में खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं, जबकि कई परिवार आसपास की झोपड़पट्टियों में शरण लिए हुए हैं।अब नगर निगम उन्हीं बेघर किए गए पीड़ित परिवारों से यह अपेक्षा कर रहा है कि वे अखबार पढ़ें, नगर निगम की विज्ञप्ति को समझें और एकमुश्त भारी भरकम राशि जमा करें। सकलेचा ने पूछा है कि क्या गरीबों को बेघर करने वाले निगम को उन्हें व्यक्तिगत रूप से नोटिस देने में भी परेशानी हो रही है?
संवेदनशीलता पर खड़े हुए सवाल
चूंकि यह मामला सीधे तौर पर अनुसूचित जाति-जनजाति और गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों के आवास और उनके मौलिक अधिकारों से जुड़ा है, इसलिए हाईकोर्ट के यथास्थिति आदेश के बीच आवंटन निरस्त करने की धमकी ने नगर निगम की कार्यप्रणाली और उसकी सामाजिक संवेदनशीलता, दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। अब शहरवासियों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि नगर निगम माननीय इंदौर हाई कोर्ट के आदेश का सम्मान करता है या फ्लैट के आवंटन निरस्त करने की अपनी जिद पर अड़ा रहता है।
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