डोसीगांव बेदखली मामला: "आवंटन निरस्त 31 अगस्त के बाद, तो 5 अगस्त को ताले क्यों ठोंके?" — पूर्व विधायक पारस सकलेचा ने शासन को घेरा, मुख्य सचिव से की उच्च स्तरीय जांच और FIR की मांग
Dosigaon eviction case: "The allotment was canceled after August 31st, so why were the houses locked on August 5th?" — Former MLA Paras Saklecha attacks the government, demanding a high-level investigation and an FIR from the Chief Secretary
बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए गरीबों को बेघर करने को बताया गंभीर अपराध; मुख्य सचिव से की उच्च स्तरीय जांच और FIR की मांग
डेली जर्नल हिंदी डेस्क
रतलाम। डोसीगांव स्थित प्रधानमंत्री आवास योजना के फ्लैटों से 208 गरीब परिवारों को बेदखल किए जाने के मामले में पूर्व विधायक पारस सकलेचा ने नगर निगम प्रशासन और राज्य सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने मुख्य सचिव तथा प्रमुख सचिव (नगरीय विकास एवं आवास विभाग) को पत्र लिखकर इस पूरी कार्रवाई को अत्यंत अमानवीय, अवैध और अमानवीय अत्याचार करार दिया है। सकलेचा ने निगमायुक्त के बयानों में विरोधाभास उजागर करते हुए सवाल उठाया कि जब आयुक्त स्वयं कह रहे हैं कि आवंटन 31 अगस्त के बाद निरस्त होगा और हितग्राही राशि जमा कर फ्लैट पा सकते हैं, तो किस विधिक अधिकार से 5 अगस्त को पुलिस बल के दम पर परिवारों का सामान बाहर फेंककर फ्लैटों पर ताले जड़े गए?
पूर्व विधायक ने बताया कि वर्ष 2020-21 में शिवनगर, प्रकाशनगर और जावरा रोड की झुग्गियों में 50-60 सालों से रह रहे दलित और गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों को नगर निगम ने लिखित आश्वासन देकर विस्थापित किया था। निगम ने वादा किया था कि गरीबों को केवल ₹20,000 की मार्जिन मनी जमा करनी होगी और शेष ₹1.80 लाख का बैंक लोन कराने की जिम्मेदारी निगम की होगी। निवासियों ने अपनी मेहनत की कमाई जमा की, आवंटन पत्र प्राप्त किए और फ्लैटों में रहने लगे। लेकिन जब निगम खुद बैंक से लोन दिलाने में नाकाम रहा, तो अपनी विफलता छिपाने के लिए 29 जुलाई के नोटिस में विधिवत आवंटित हितग्राहियों को ही "अवैध कब्जाधारी" बता दिया गया।
166 एनपीए खातों की सजा 208 निर्दोष परिवारों को क्यों? सकलेचा ने उठाई तुरंत पुनर्वास की मांग
सकलेचा ने महापौर के बयानों पर भी तीखे सवाल दागे। उन्होंने कहा कि यदि 166 अन्य ऋण धारकों के खाते एनपीए (NPA) हो गए थे, तो उसकी सजा उन 208 गरीब परिवारों को क्यों दी जा रही है जिनका लोन निगम ने स्वीकृत ही नहीं कराया? जब पंजाब नेशनल बैंक ने लोन देने से मना किया, तो नगर निगम ने किसी दूसरे वित्तीय संस्थान या बैंक से ऋण दिलाने का प्रयास क्यों नहीं किया? बिना विधिसम्मत आवंटन निरस्त किए, महिलाओं और बच्चों को जबरन बाहर निकालकर उनके आशियाने पर सील लगाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और कानूनों का सीधा उल्लंघन है।
सकलेचा ने राज्य सरकार से मांग की है कि इस पूरे प्रकरण की किसी वरिष्ठ एवं निष्पक्ष अधिकारी से उच्च स्तरीय प्रशासनिक व विधिक जांच कराई जाए। इसके साथ ही, अमानवीय कृत्य करने वाले दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय कर उन पर आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाए। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि सभी 208 बेघर परिवारों को तुरंत उनके फ्लैटों में पुनः प्रवेश दिलाया जाए और निगम के मूल वादे के अनुसार उन्हें बैंक से ऋण उपलब्ध कराने की पारदर्शी व्यवस्था की जाए।
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